(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

सभापर्व ~ महाभारत | Mahabharat Sabha Parv In Hindi


॥ श्रीः ॥
2.58. अध्यायः 058
Mahabharata - Sabha Parva - Chapter Topics
कृष्णदर्शनाय वसुदेवादीनामागमनम्॥1॥ रामकृष्णाभ्यां पित्रादिवन्दनपूर्वकं बन्धुभ्यो रत्नादिवितरणम्॥ 2॥ इन्द्रस्य कृष्णचरितप्रशंसनपूर्वकं स्वलोकगमनम्॥ 3॥
Mahabharata - Sabha Parva - Chapter Text

भीष्म उवाच।

एवमालोकयाञ्चक्रुर्द्वारकामृषभास्त्रयः।
उपेन्द्रबलदेवौ च वासवश्च महायशाः॥ 2-58-1(13652)
ततस्तं पाण्डरं शौरिर्मूर्ध्नि तिष्ठन्गरुत्मतः।
प्रीतः शङ्खमुपाध्मासीद्द्विषतां रोमहर्षणम्॥ 2-58-2(13653)
तस्य शङ्खस्य शब्देन सारश्चुक्षुभे भृशम्।
ररास च नभः सर्वं तच्चित्रमभवत्तदा॥ 2-58-3(13654)
पाञ्चजन्यस्य निर्घोषं निशम्य कुकुरान्दकाः।
प्रीयमाणाः समाजग्मुरालोक्य मधुसूदनम्॥ 2-58-4(13655)
वसुदेवं पुरस्कृत्य वेणुशङ्खरवैः सह।
उग्रसेनो ययौ राजा वासुदेवनिवेशनम्॥ 2-58-5(13656)
आनन्दितुं पर्यचन्स्वेषु वेश्मसु देवकी।
रोहिणी च ययौ देशमाहुकस्य च याः स्त्रियः॥ 2-58-6(13657)
हता ब्रह्मद्विषः सर्वे जयन्त्यन्धकवृष्णयटः।
एवमुक्तः सह स्त्रीभिरक्षतैर्मधुसूदनः॥ 2-58-7(13658)
ततः शौरिः सुपर्णेन स्वं निवेशनमभ्ययात्।
चकाराथ यथोद्देशमीश्वरो मणिपर्वतम्॥ 2-58-8(13659)
ततो धनानि रत्नानि सभायां मधुसूदनः।
निधाय पुण्डरीकाक्षः पितुर्दर्शनलालसः॥ 2-58-9(13660)
ततः सान्दीपिनिं पूर्वं ब्राह्मणं चापि भारत।
यथान्यायं वासुदेव उपस्पृष्ट्वा महायशाः॥ 2-58-10(13661)
ववन्दे पृथुताम्राक्षः प्रीयमाणो महायशाः।
तथाऽश्रुपरिपूर्णाक्षमानन्दभृतचेतसम्॥ 2-58-11(13662)
ववन्दे सह रामेण पितरं वासवानुजः।
ताभ्यां च मूर्ध्न्युपाघ्रातः केशवः परवीरहा॥ 2-58-12(13663)
यथाश्रेष्ठमुपागम्य सात्वतान्यदुनन्दनः।
सर्वेषां नाम जग्राह दाशार्हाणामधोक्षजः॥ 2-58-13(13664)
ततः सर्वाणि वित्तानि सर्वरत्नमयानि च।
व्यभजत्तानि तेभ्योऽथ सर्वेभ्यो यदुनन्दनः॥ 2-58-14(13665)
सा केशवमहामात्रैर्महेन्द्रप्रतिमैः सभा।
शुशुभे वृष्णिशार्दूलैः सिंहैरिव गिरेर्गुहा॥ 2-58-15(13666)
अथासनगतान्सर्वानुवाच विबुधाधिपः।
शुभया हर्षयन्वाचा महेन्द्रस्तान्महायशाः।
कुकुरान्धकमुख्यांश्च तं च राजानमाहुकम्॥ 2-58-16(13667)
इन्द्र उवाच। 2-58-17x(1483)
यदर्थं जन्म कृष्णस्य मानुषेषु महात्मनः।
यत्कृतं वासुदेवेन तद्वक्ष्यामि समासतः॥ 2-58-17(13668)
अयं शतसहस्राणि दानवानामरिन्दमः।
निहय् पुण्डरीकाक्षः पातालविवरं ययौ॥ 2-58-18(13669)
यच्च नाधिगतं पूर्वैः प्रह्लादबलिशम्बरैः।
तदिदं शौरिणा वित्तं प्रापितं भवतामिह॥ 2-58-19(13670)
सपाशं मुरमाक्रमय् पाञ्चजन्यं च धीमता।
शिलासङ्घानतिक्रम्य निशुम्भः सगणो हतः॥ 2-58-20(13671)
हयग्रीवश्च विक्रान्तो दानवो निहतो बली।
मथितश्च मृधे भौमः कुण्डले चाहृते पुनः॥ 2-58-21(13672)
पुनर्बाणवधे शौरिमादित्या वसुभिः सह।
मन्मुखा आगमिष्यन्ति साध्याश्च मधुसूदनम्॥ 2-58-22(13673)
एवमुक्त्वा ततः सर्वानामन्त्र्य कुकुरान्धकान्।
सस्वजे रामकृष्णौ च वसुदेवं च वासवः॥ 2-58-23(13674)
प्रद्युम्नसाम्बप्रमुखाननिरूद्धं च सारणम्।
बभ्रुं झल्लिं गदं भानुं चारुदेष्णं च वृत्रहा॥ 2-58-24(13675)
सत्कृत्य सारणाक्रूरौ पुनराभाष्य सात्यकिम्।
सस्वजे वृष्णिराजानमाहुकं कुकुराधिपम्।
भोजं च कृतवर्णाणमन्यांश्चान्दकवृष्णिषु॥ 2-58-25(13676)
आमन्त्र्य देवप्रवरैर्वासवो वासवानुजम्।
ततः श्वेताचलप्रख्यं गजमैरावतं प्रभुः॥ 2-58-26(13677)
पश्यतां सर्वभातानामारुरोह शचीपतिः।
पृथिवीं चान्तरिक्षं च दिवं च वरवारणम्॥ 2-58-27(13678)
मुखाडम्बरनिर्घोषैः पूरयन्तमिवासकृत्।
हैमयन्त्रमहाकक्ष्यं हिरण्मयविषाणिनम्॥ 2-58-28(13679)
मनोहरकुथास्तीर्णं सर्वरत्नविभूषितम्।
नित्यस्रुतमदस्रावं क्षरन्तमिव तोयदम्॥ 2-58-29(13680)
दिशागजं महामात्रं काञ्चनस्रजमास्थितः।
प्रबभौ मन्दराग्रस्थः प्रतपन्भानुमानिव॥ 2-58-30(13681)
ततो वज्मयं भीमं प्रगृह्य परामाङ्कुशम्।
ययौ बलवता सार्धं पावकेन शचीपतिः॥ 2-58-31(13682)
तं करेणुगजव्रातैर्विमानैश्च मरुद्गणाः।
पृष्ठतोऽनुययुः प्रीताः कुबेरवरुणग्रहाः॥ 2-58-32(13683)
स वायुपक्षमास्थाय वैश्वानरपथं गतः।
प्राप्य सूर्यपथं देवस्तत्रैवान्तरधीयत॥ ॥ 2-58-33(13684)

इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि अर्घाहरणपर्वणि अष्टपञ्चाशोऽध्यायः॥ 58॥


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